झारखंड में अस्पतालों की हालत – लाचार है,
क्योंकि यहां के लोग और सरकार भी लाचार है.
जिसको कुछ भी नहीं मतलब है एक दूसरे से.
तभी तो यहां पर एंबुलेंस नहीं, डॉक्टर नहीं, अस्पताल नहीं
ऐसे में दूसरे राज्य की घटना पर स्वास्थ्य मंत्री के बयान ने कई सवाल खड़े किए हैं।
अपने घर में आग, और पड़ोसी को पानी देने की बात
कहते हैं, दर्द वही समझता है जो उसे झेलता है।
लेकिन जब अपने ही घर में आग लगी हो और कोई दूसरे के घर की आग बुझाने की बातें करने लगे, तो सवाल उठना लाज़मी है।
झारखंड आज उसी मोड़ पर खड़ा है।
बिहार में महिला डॉक्टर नुसरत परवीन से जुड़ी घटना के बाद झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी का बयान सामने आया।

इरफान अंसारी का प्रस्ताव
डॉ. इरफान अंसारी ने अपने ट्वीट में कहा कि बिहार की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। उन्होंने इसे महिला सम्मान, संविधान और इंसानियत से जोड़ते हुए नुसरत परवीन को झारखंड आने का प्रस्ताव दिया।
ट्वीट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि यदि वे चाहें तो झारखंड सरकार उन्हें—
- ₹3 लाख मासिक वेतन
- सरकारी नौकरी
- मनचाही पोस्टिंग
- सरकारी फ्लैट
- पूर्ण सुरक्षा और सम्मानजनक कार्य वातावरण
देगी।
लेकिन झारखंड की सच्चाई क्या कहती है?
इसी झारखंड में—
- सरकारी अस्पतालों में एंबुलेंस समय पर नहीं मिलती
- मरीजों को स्ट्रेचर तक नसीब नहीं
- गरीब परिजन इलाज के लिए दर-दर भटकते हैं
- कुछ जगह हॉस्पिटल तो है लेकिन डॉक्टर खुद का क्लीनिक खोल के बैठे है.
- और सबसे बड़ी बात लोगों को सरकार के द्वारा बनाए गए सरकारी अस्पतालों पर भरोसा भी नहीं है. लोग प्राइवेट अस्पतालों पर ज्यादा भरोसा करते है।
झारखण्ड सरकार में स्वास्थ्य मंत्री इरफ़ान अंसारी को सबसे पहले अपने राज्य के लोगों पर ध्यान देने की जरूरत है जिसके वजह से आज आप मंत्री है…
अभी हाल ही में पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) की घटना इसका सबसे कड़वा सच है, जहां एक पिता को अपने चार साल के बच्चे का शव थैले में रखकर बस से घर ले जाना पड़ा, क्योंकि अस्पताल वालों ने एंबुलेंस देने से मना कर दिया , हो सकता है उसके पास एम्बुलेंस का किराया देने तक के पैसे नहीं होंगे
तो राज्य सरकार उनको ऐसे ही, मरने के लिए छोड़ देता है क्यों वे
गरीब लोग है, क्या ही करेंगे…
जिस जिन वो गरीब आदमी जाग गया न…
उस दिन ???
सवाल इरादों पर नहीं, प्राथमिकताओं पर है
बिहार की घटना संवेदनशील है, इसमें कोई दो राय नहीं।
नीतीश कुमार के व्यवहार पर बहस हो सकती है, असहमति भी। लेकिन यह भी सच है कि उस घटना को लेकर राजनीतिक और भावनात्मक उबाल जरूरत से ज्यादा पैदा किया गया।
असली सवाल यह है—
क्या झारखंड की अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी मजबूत है कि हम दूसरों को आदर्श दिखाने निकल पड़ें?
जब अपने राज्य के अस्पतालों में मरीज सम्मान से इलाज नहीं करा पा रहे हों, तब बाहर की घटना पर बड़े प्रस्ताव देना क्या माना जाएगा
मानवता भाषणों से नहीं, व्यवस्था से दिखती है।
सम्मान प्रस्तावों से नहीं, अस्पतालों की हालत से झलकता है।
जब झारखंड का हर मरीज सुरक्षित, सम्मानित और समय पर इलाज पाएगा—
तभी दूसरे राज्यों को संदेश देना सच में नैतिक लगेगा।
वरना यह वही बात है—
अपने घर में आग लगी हो, और हम पड़ोसी को पानी देने की बातें कर रहे हों।
