झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren ने हालिया सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि कोई भी घटना-दुर्घटना किसी के साथ हो सकती है और सरकार का दायित्व है कि आहत परिवारों तक सहायता पहुँचे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार की सोच “राज्य के अंतिम व्यक्ति तक” योजनाओं और मदद को पारदर्शिता के साथ पहुँचाने की है।
लेकिन सवाल यह है कि पीड़ित परिवारों को Urgent help कैसे पहुंचेगी। और
यह सोच अब तक ज़मीन पर कितनी उतरी है ?

मुख्यमंत्री Hemant Soren का बयान क्या कहता है?
मुख्यमंत्री ने अपने पोस्ट में कहा कि—
- दुर्घटना या विपत्ति में फँसे परिवारों को सहायता मिलनी चाहिए
- सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन व स्वास्थ्य लाभ की व्यवस्था है
- सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि योजनाएँ पारदर्शिता के साथ लोगों तक पहुँचें
- सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से नागरिकों को सशक्त किया जाए
अब तक ज़मीन पर क्या हुआ है?
जहाँ काम हुआ है
- मीडिया/सोशल मीडिया से सामने आए मामलों में संज्ञान
- जिला प्रशासन द्वारा जांच
- शिक्षा, स्वास्थ्य या समाज कल्याण विभाग को निर्देश
- कुछ मामलों में तत्काल राहत
- बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था
- इलाज में सहायता
- अस्थायी आर्थिक मदद
- DC स्तर पर
- निर्देश जारी होते हैं
- संबंधित विभागों को जवाबदेही दी जाती है
जहाँ व्यवस्था कमजोर है
- हर पीड़ित तक अपने आप सिस्टम नहीं पहुँचता
- जो मामले वायरल नहीं होते
- जिनकी आवाज़ मीडिया तक नहीं जाती
→ वहाँ मदद अक्सर नहीं पहुँचती
- स्थायी सहायता में भारी देरी
- पेंशन
- नियमित आर्थिक सहायता
- दीर्घकालीन शिक्षा सहयोग
- ‘अंतिम व्यक्ति’ तक पहुँचने की कोई ऑटोमैटिक प्रणाली नहीं
- पंचायत/वार्ड स्तर पर सक्रिय सर्वे नहीं
- ज़्यादातर मदद शिकायत या पोस्ट पर निर्भर
अंतिम व्यक्ति तक मदद कैसे पहुँचेगी?
सरकार के बयान के अनुसार मदद पहुँचाने की प्रक्रिया इस प्रकार होनी चाहिए—
- जिला प्रशासन द्वारा पहचान
- विभागीय समन्वय
- योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थी तक
लेकिन व्यवहार में:
- कोई केंद्रीकृत ट्रैकिंग सिस्टम नहीं
- समय-सीमा तय नहीं
- जवाबदेही स्पष्ट नहीं
प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि
“झारखंड में समस्या नीयत की नहीं, संरचना (System Design) की है। जब तक खोज-आधारित (Proactive) मॉडल नहीं बनेगा, अंतिम व्यक्ति तक मदद नहीं पहुँचेगी।”
- 30–40% मामलों में असर दिखता है
- 60% से अधिक लोग अभी भी सिस्टम से बाहर हैं
