21वीं सदी में तेल और गैस की जगह अब दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) ने ले ली है। यही खनिज भविष्य की अर्थव्यवस्था, इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs), स्मार्टफोन, सोलर एनर्जी, 5G उपकरणों, मिसाइलों और अंतरिक्ष तकनीकों की रीढ़ हैं। दुनिया की महाशक्तियाँ इन खनिजों पर कब्ज़े के लिए संघर्ष कर रही हैं, और इस वैश्विक दौड़ में ऑस्ट्रेलिया एक नए खनिज सुपरपावर के रूप में उभर रहा है।

दुर्लभ खनिज क्या हैं और क्यों ज़रूरी हैं?
दुर्लभ खनिज 17 ऐसे महत्वपूर्ण तत्व हैं जिनका उपयोग:
- डिफेंस टेक्नोलॉजी (मिसाइल, रडार, फाइटर जेट)
- इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी
- मोबाइल और 5G चिप्स
- सोलर और विंड एनर्जी सिस्टम
- एयरोस्पेस सेक्टर
में होता है। जिन देशों के पास इन खनिजों का भंडार और नियंत्रण होगा, वही भविष्य की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संतुलन तय करेंगे।
चीन की एकाधिकार से चिंता और ऑस्ट्रेलिया का अवसर
वर्तमान में वैश्विक Rare Earth उत्पादन का 58% चीन करता है और करीब 85% प्रोसेसिंग प्लांट चीन में स्थित हैं।
इस वजह से अमेरिका, जापान, भारत और यूरोपीय देश इस निर्भरता को कम करना चाहते हैं।
ऐसे में ऑस्ट्रेलिया एक सुरक्षित विकल्प बनकर सामने आया है।
ऑस्ट्रेलिया के पास क्या है?
- दुनिया के तीसरे सबसे बड़े Rare Earth भंडार
- स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्था
- आधुनिक खनन तकनीक
- चीन पर निर्भरता कम करने को तैयार पश्चिमी देश
ऑस्ट्रेलिया अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) का नया केंद्र बनने की ओर बढ़ रहा है।
ऑस्ट्रेलिया की नई खनिज नीति
ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने Rare Earth Minerals को “राष्ट्रीय सुरक्षा संसाधन” घोषित किया है।
सरकार:
- खनन कंपनियों को सब्सिडी दे रही है
- चीन की जगह सीधे अमेरिका, भारत, जापान को निर्यात बढ़ा रही है
- ऑस्ट्रेलिया को “मिनरल हब ऑफ द वर्ल्ड” बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है
ऑस्ट्रेलिया का Lynas Corporation पहले से चीन के बाहर Rare Earth उत्पादन करने वाली सबसे बड़ी कंपनी बन चुकी है।
वैश्विक भू-राजनीति पर प्रभाव
Rare Earth की यह जंग केवल आर्थिक नहीं है — यह एक भू-राजनीतिक शक्ति संघर्ष है।
| देश | रणनीति |
|---|---|
| चीन | उत्पादन और कीमत पर नियंत्रण रखकर दबाव बनाना |
| अमेरिका | ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका से सप्लाई सुनिश्चित करना |
| भारत | ऑस्ट्रेलिया के साथ सामरिक खनिज साझेदारी |
| यूरोप | चीन पर निर्भरता कम करना |
भारत और झारखंड के लिए अवसर व चुनौती
भारत भी Rare Earth उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, आंध्र प्रदेश में इन खनिजों के संकेत मिले हैं।
विशेष रूप से झारखंड, जो पहले कोयला और लौह अयस्क के लिए जाना जाता था, अब Rare Earth तलाश की ओर भी बढ़ रहा है।
भारत ने ऑस्ट्रेलिया के साथ “Critical Minerals Partnership” किया है:
- Lithium, Cobalt, Nickel, Rare Earth की संयुक्त खोज
- भारत में प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करने की योजना
- Make in India के तहत बैटरी और डिफेंस उत्पादन को बढ़ावा
पर्यावरण और आर्थिक संतुलन
खनन की यह दौड़ लाभदायक होते हुए भी पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
Rare Earth निकालने पर Radioactive कचरा भी उत्पन्न होता है।
इसलिए ऑस्ट्रेलिया इसे “Clean Mining Technology” के साथ जोड़ने पर काम कर रहा है—यही मॉडल भारत भी अपनाना चाहेगा।
निष्कर्ष: आने वाला समय ‘खनिज शक्ति’ का युग होगा
यह स्पष्ट है कि Rare Earth Minerals आने वाले समय के “Oil of the Future” बन चुके हैं।
ऑस्ट्रेलिया धीरे-धीरे एक वैश्विक खनिज महाशक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है।
भारत को इस अवसर का लाभ उठाते हुए सामरिक साझेदारी, घरेलू खनिज खोज और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ानी होगी।
जो देश खनिजों को नियंत्रित करेगा, वही भविष्य की अर्थव्यवस्था, रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा को नियंत्रित करेगा।
