कुड़मी समाज ने घोषणा की है कि 22 फरवरी प्रभात तारा मैदान रांची में फिर से बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। कुड़मी समाज का कहना है कि यह संघर्ष पिछले 75 वर्षों से जारी है, लेकिन अब तक मांगें पूरी नहीं हुई हैं, इसलिए इस बार आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। कुड़मी समाज/आदिवासी कुड़मी समाज लंबे समय से अपनी संविधानिक पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। इस संघर्ष का मुख्य उद्देश्य है —
- कौन है कुड़मी समाज?
- 75 वर्षों का आंदोलन — कब-कब हुआ?
- 1950 – संविधान लागू और ST से बाहर होना
- 1960–1970 – प्रारंभिक स्थानीय विरोध
- 1980 – संगठित समुदाय आंदोलन
- 1990 – राज्य स्तर पर आंदोलन बढ़ा
- 2000 – पहले राष्ट्रीय स्तर के संगठित प्रयास
- 2010 – भाषा और सांस्कृतिक पहचान जोड़ना
- 2013 – पहली बार रोड/रेल प्रदर्शन
- 2022 – रेल रोको आंदोलन (सबसे बड़ा पहली बार)
- 2023 – रेल रोको और रोड ब्लॉक प्रदर्शन (दूसरा बार)
- 2025 – 20 सितंबर से अनिश्चितकालीन रेल रोको आंदोलन
- 2025 – 11 नवंबर वोट बहिष्कार
- 2025 – आदिवासी समुदाय का विरोध प्रदर्शन
- 2026 – 22 फरवरी महा आंदोलन
- मांग क्यों अब तक पूरी नहीं हुई?
- अब 22 फरवरी 2026 की तैयारी
- कुड़मी समुदाय का यह आंदोलन लंबे समय से चली आ रही पहचान और समान अधिकार की लड़ाई है।समाज का मानना है कि उनके सांस्कृतिक इतिहास, भाषा और संघर्ष की वजह से उन्हें ST दर्जा और भाषा मान्यता मिलनी चाहिए, लेकिन यह मामला संवैधानिक प्रक्रिया, विरोध और राजनीति की वजह से अब तक पूरा नहीं हो पाया है।
अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा पाना
कुड़माली भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करना
आज भी यह आंदोलन जारी है और 22 फरवरी 2026 को इसे और ज़्यादा प्रभावशाली बनाया जाएगा।
कौन है कुड़मी समाज?
कुड़मी समुदाय (Kudmi Mahato) भारत के पूर्वी हिस्सों — झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में फैला हुआ कृषि-आधारित समुदाय है। ये पारंपरिक रूप से खेतिहर किसान रहे हैं और कई क्षेत्रों में पूर्व में जनजाति के रूप में सूचीबद्ध थे। हालांकि 1950 में संविधान में ST सूची बनने के बाद उन्हें सूची से हटा दिया गया, जिससे उनका सामाजिक-राजनीतिक दर्जा बदल गया।
वे अपने को Sarna/देसी धार्मिक परंपरा वाले समुदाय के रूप में भी मानते हैं, जो प्रकृति-पूजा और जनजातीय संस्कृति से जुड़ा हुआ है।
75 वर्षों का आंदोलन — कब-कब हुआ?
कुड़मी समाज की लड़ाई पुरानी है — और समय-समय पर यह संघर्ष कई रूपों में सामने आया है:
1950 – संविधान लागू और ST से बाहर होना
ब्रिटिश भारत में 1931 की जनगणना में कुड़मी/कुड़मी समाज जनजाति/आदिवासी सूची में था,
लेकिन 1950 में स्वतंत्र भारत का संविधान लागू होने के बाद इन्हें ST सूची से हटा दिया गया।
इसी से आंदोलन की शुरुआत हुई।
1960–1970 – प्रारंभिक स्थानीय विरोध
इस दौर में कुड़मी जाति ने अलग-अलग गांव/जिलों में बैठकें की और
मुख्य रूप से सरकार को ज्ञापन और स्थानीय प्रदर्शन के जरिए यह मांग रखी कि उन्हें ST में दोबारा शामिल किया जाए।
इस समय आंदोलन संगठित रूप से तो नहीं था, लेकिन आवाज उठाई गयी।
1980 – संगठित समुदाय आंदोलन
1980 के दशक में कुड़मी समाज ने पहली बार संगठित ढंग से धरना,रैली,ज्ञापन जैसे तरीकों से ST दर्जा मांगना शुरू किया।
यह पहला बड़ा कदम माना जाता है कि आंदोलन स्थिर, लगातार और स्पष्ट उद्देश्य लेकर चल रहा है।
1990 – राज्य स्तर पर आंदोलन बढ़ा
इस दशक में झारखंड, बंगाल और ओडिशा में कुड़मी समाज के युवा और संगठन परिषद बनाई गई,
शिक्षा व नौकरी में आरक्षण, ST श्रेणी में शामिल होने की मांग जोर पकड़ने लगी।
2000 – पहले राष्ट्रीय स्तर के संगठित प्रयास
2000 के बाद आंदोलन को राष्ट्रीय मंच बनाने की कोशिश हुई।
अलग-अलग समुदायों ने कुड़मी की स्थिति पर बहस की, और ST दर्जा देने के लिए कुड़मी समाज ने संसद/राज्यसभा/लोक सभा तक अपनी आवाज को पहुँचाने का प्रयास किया।
2010 – भाषा और सांस्कृतिक पहचान जोड़ना
इस दशक में आंदोलन में दो चीजें स्पष्ट रूप से जुड़ीं:
ST दर्जा
कुड़माली भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग
इससे संघर्ष का स्वरूप सिर्फ सरकारी लाभ नहीं, सांस्कृतिक अधिकारों तक फैल गया।
2013 – पहली बार रोड/रेल प्रदर्शन
इस साल बड़े पैमाने पर रेल और सड़क जाम की रणनीति अपनाई गयी ताकि सरकार और मीडिया का ध्यान आंदोलन पर केंद्रित हो।
यह एक ग़ैर-परंपरागत आंदोलन था, जिसका असर यूज़र्स और जनता पर भी पड़ा।
2022 – रेल रोको आंदोलन (सबसे बड़ा पहली बार)
इस वर्ष, कुड़मी समाज ने तीन राज्यों — झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा — में रेल रोको आंदोलन चलाया।
इसका उद्देश्य था ST दर्जा और भाषा मान्यता की मांग को व्यापक स्तर पर उठाना।
यह आंदोलन लगभग 5 दिनों तक लगातार रहा और रेलवे सेवाओं को भारी प्रभाव पड़ा।
2023 – रेल रोको और रोड ब्लॉक प्रदर्शन (दूसरा बार)
पिछली बार की तरह, 2023 में पुनः रेल और सड़क दोनों को जाम किया गया।
ट्रेनें रद्द हुईं, यातायात बाधित हुआ और आंदोलन को राजनीतिक ध्यान मिला।
इस दौरान आंदोलन के कारण रेलवे को करोड़ों का नुकसान बताने वाली रिपोर्ट भी सामने आई।
2025 – 20 सितंबर से अनिश्चितकालीन रेल रोको आंदोलन
इस साल कुड़मी समाज ने 20 सितंबर 2025 तक अनिश्चितकालीन रेल रोको आंदोलन शुरू रखा।
यह प्रमुख रूप से ST दर्जा, कुड़माली भाषा की मान्यता, और पारंपरिक पैंसों की कानूनी मान्यता की मांग था।
इस आंदोलन को कोर्ट ने अवैध भी बताया था, लेकिन समाज ने शांतिपूर्ण तरीके से रेल ट्रैकों पर धरना दिया।
2025 – 11 नवंबर वोट बहिष्कार
इसी साल कुड़मी समाज ने घाटशिला उपचुनाव का बहिष्कार करने की धमकी दी अगर मांगों पर बातचीत नहीं होती।
यह आंदोलन रणनीतिक रूप से राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया गया था।
2025 – आदिवासी समुदाय का विरोध प्रदर्शन
आंदोलन को लेकर आदिवासी संगठनों ने खुद रांची में विरोध मार्च किया और ST सूची में शामिल करने का विरोध जताया।
उनका कहना था कि कुड़मी को ST सूची में डालने से मौजूदा आदिवासी समुदायों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
2026 – 22 फरवरी महा आंदोलन
अब आंदोलन अपने सबसे बड़े चरण पर पहुँच गया है, जिसमें कुड़मी समाज चाहता है कि 22 फरवरी को पाँच लाख से अधिक लोग शामिल हों।
यह 75 वर्षों की लगातार मांगों और संघर्षों का विस्तारपूर्वक नया चरण माना जा रहा है।
आंदोलन क्यों हो रहा है?
कुड़मी समाज की मुख्य मांगें हैं —
ST दर्जा
कुड़माली भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल करना
समुदाय का कहना है कि इससे उन्हें —
सरकारी नौकरियों में आरक्षण
शिक्षा और छात्रवृत्ति लाभ
सांस्कृतिक अस्तित्व की सुरक्षा
सामाजिक-आर्थिक विकास
जैसे लाभ मिलेंगे। उन्होंने कहा है कि पंजाब, उत्तर भारत आदि में भी कुड़मी समुदाय का दर्जा अलग-थलग है और स्थानीय स्तर पर वे आर्थिक रूप से पिछड़े रहे हैं।
मांग क्यों अब तक पूरी नहीं हुई?
ST सूची में शामिल होने का निर्णय बेहद संवैधानिक प्रक्रिया से होकर होता है —
- राज्य सरकार को प्रस्ताव पास करना
- केंद्र सरकार के मंत्रालय से जांच
- Registrar General ऑफ़ India की पुष्टि
- राष्ट्रीय आयोग की जांच
- फिर संसद/कबिनेट द्वारा संशोधन किया जाना
यह बहुत समय लेता है और राजनीतिक संतुलन पर भी असर डालता है।
कुछ आदिवासी संगठनों का विरोध भी है — वे कहते हैं कि कुड़मी समाज को ST में शामिल करना अन्य आदिवासी समुदायों के अधिकारों को कम कर सकता है।
अब 22 फरवरी 2026 की तैयारी
समाज ने घोषणा की है कि 22 फरवरी 2026 को महाआंदोलन होगा जिसमें —
पाँच लाख से अधिक लोग शामिल होंगे
शांतिपूर्ण तरीके से विचारधारा और मांगें सरकार के सामने रखी जाएँगी
राज्य और केंद्र दोनों को दबाव बनाने की योजना है
कुड़मी नेताओं का कहना है कि इस बार व्यापक जनसमर्थन और तैयारी के कारण सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है और उनकी मांगों पर ध्यान दिए जाने की उम्मीद है।
कुड़मी समुदाय का यह आंदोलन लंबे समय से चली आ रही पहचान और समान अधिकार की लड़ाई है।
समाज का मानना है कि उनके सांस्कृतिक इतिहास, भाषा और संघर्ष की वजह से उन्हें ST दर्जा और भाषा मान्यता मिलनी चाहिए, लेकिन यह मामला संवैधानिक प्रक्रिया, विरोध और राजनीति की वजह से अब तक पूरा नहीं हो पाया है।
अब 22 फरवरी की महाआंदोलन को एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है — जो सरकार पर नई गंभीर बहस शुरू कर सकता है।
